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मखाना के बारे मे उपयोगी बाते जो आप नहीं जानते होंगे ।

भारत मे व्रत के समय प्रायः खाए जाने वाले मखाने के बारे मे आज हम आपको ऐसी बाते बताने जा रहे जा है। जो आपको काफी ज्यादा रोचक लगेगी। अगर इसके लाभ के बारे मे बात  करे तो यह रक्तचाप को काम करने के अचूक दावा है, इसमे मोनो संतृप्त वसा  बहुत कम या न के बराबर होती है। यह और तो और रक्त मे सर्करा के स्तर को भी कम करती है। इसके अलावा ब्लड प्रेशर ,ब्लड शुगर ,क्रानिक डाई रिया ,व गठिया जैसे रोगों को रोकने मे भी मदद करती है। अगर आपके शरीर मे कैल्सीअम की कमी है तो डॉक्टर आपको मखाना खाने की सलाह दे सकते है। क्युकी मखाना के बीज मे कैल्सीअम ,व कई अन्य सुक्ष्म खनिज तत्व रहते है, । मखाने मे glocoside का संघटन काफी मात्र मे होता है। जिससे यह हाड़े रोगी के लिए भी किसी वरदान से कम नहीं है। इससे तयार मिठाई उच्च ऊर्जा व कम चीनी होती है। ये केवल पोषण वाला ही नहीं बल्कि स्वस्थ के लिए भी फायदेमंद भोजन है।


मखाने से निर्मित उत्पाद व उत्पादन विधि :-
मखाने के बीज को 48 घंटों के लिए 30-45 डिग्री पर सुखाए। बीज खोल हटाने के लिए काम तापमान पर अधिक समय तक बीज को सुखना चाहिए । फिर गुठली आसानी से भूसा से अलग हो जाती है। फिर इन बीजों का पाउडर बना लिया जाता है। मखाने व गेहू के आटे को मिलकर चपाती बनाने के काम लिया जाता है। मखाने की बर्फ़ी तयार करने के लिए मखाना पाउडर व दूध के साथ मिलकर बनाते है। मखाने के पाउडर से पकोड़ी व अन्य स्वादिस्ट भोजन निर्मित कीये जा सकते है। । 
और तो और इससे कई प्रकार के स्नैक्स भी बनाये जाते है।
मखाने का क्यू करे सेवन :-
मानव स्वस्थ के लिया आज मखाना वरदान साबित हो रहा है। यह हमारी केवल खाध संबंधी समस्याओ को हाल नहीं करता बल्कि ये पूर्णतः स्वास्थ वर्धक भी है। हमे कम से कम एक सप्ताह मे एक बार मखाने के आटे से बनी रोटी या मखाने से बना कोई भी उत्पाद जरूर कहना चाहिए । इसका उपयोग बहुत सी दवाओ खासकर आयुर्वेदिक मे इस लिए इसे देवो का भोजन कहा गया है। इसका प्राचीन कल से ही उपयोग व्रतों मे खाने के लिए किया जाता है। जिससे आप के शरीर मे ऊर्जा का balance  बनाये रखता है। 
मखानों के उत्पादों मे बिभिन पोशाक तत्व :-
मखाने द्वारा निर्मित बर्फ़ी मे प्रोटीन 5.40%,कार्बोहाइड्रट 25.47%,वासिय अम्ल 4.37%,कुल घुलनशील सर्करा 19.33%,कैलरी 160.33 जो पर 100 ग्राम पर।
मखाने के बैज्ञानिक तथ्य व खेती का स्थान:-
इसका यह प्लाण्टी किंगडम के अजीनोस्पेर्म जाती से संबंधित है।इसका वैज्ञानिक नाम euryale है।यह मुख्यतः ईस्टर्न एशिया व साउथर्न एशिया में पाया जाता है।भारत मे इसकी खेती अधिकांश बिहार राज्य में कई जाती है।ये बिहार के लगभग 9 जिलो में बोया जाता है।वे जिले है मधुबनी,दरभंगा,कटिहार,सीतामढ़ी,अररिया ,किशनगंज,तथा भारत के मणिपुर में भी इसकी खेती व्यापक रूप से होति है।मणिपुर के लोकल लोग इसे थांगजिंग कहते है।ये एशिया के अन्य देश कोरिया ,जापान व रूस में भी उगाया जाता है।आपको गर्व होगा कि इतना पोषण से भरा ये फल पूरे विश्व। में 90 प्रतिशत उत्पादन केवल और केवल बिहार से होता है।इसे फॉक्स नट के रूप में भी जाना जाता है।
खेती कैसे होता है:-
ये जलीय पौधा है।जो जल में ही उगाया जाता है।इसका फूल बैगनी रंग का होता है।कमल के पुष्प के समान ये फूल बाद ही मोहक लगता है।इसके खेती में किसानों को काफी समस्याओ का सामना भी करना पड़ता है।जैसे जल में उपस्थित जोक, सर्प व अन्य विषैले जीवो से उनको बचना पड़ता है।किसानों को ज्यादा समय तक पानी मे रहने पड़ता है।परिणाम स्वरूप किसानों में कई प्रकार के त्वचा रिग होने का डर होता है।
        इतने ज्यादा औषधीय गुणों से भरपूर इस वस्तु का पूरे विश्व के सभी देशों से मांग आती है।हर देश के नागरिक लगभग इससे परिचत है।पश्चिम देशो में इसे फॉक्स नट के नाम से विख्यात है।
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